Leo movie Review in Hindi– विजय की दमदार एक्शन फिल्म देखने लायक है या नहीं?

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Leo movie Review in Hindi – जानिए विजय और संजय दत्त की एक्शन से भरपूर फिल्म “Leo” देखने लायक है या नहीं। पढ़ें पूरी कहानी, समीक्षा, एक्टिंग एनालिसिस और दर्शकों की प्रतिक्रिया एक ही जगह।

Leo movie Review

लोकेश कनगराज द्वारा निर्देशित “Leo” साल 2023 की सबसे चर्चित एक्शन-थ्रिलर फिल्मों में से एक है। इसमें थलापथी विजय, संजय दत्त, अर्जुन सरजा, और तृषा कृष्णन ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं।
फिल्म का नाम भले ही छोटा है, लेकिन इसमें छिपी कहानी एक जटिल पहचान, अतीत के रहस्य और पारिवारिक संघर्षों पर आधारित है।
तो आइए जानें — क्या Leo फिल्म वाकई देखने लायक है या नहीं?

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Leo मूवी की कहानी

हिमाचल प्रदेश के बर्फीले पहाड़ों के बीच बसा एक शांत-सा कस्बा — जहाँ पार्थीबन (विजय) अपनी पत्नी सत्या (तृषा) और दो बच्चों के साथ सादगीभरी लेकिन खुशहाल जिंदगी गुजार रहा है।
पार्थीबन का एक प्यारा-सा कैफे है, और वह सिर्फ कॉफी परोसने वाला शख्स नहीं, बल्कि जानवरों का सच्चा हमदर्द भी है।
वन विभाग की टीम के साथ वह अकसर घायल या फंसे हुए जीवों को बचाने में लगा रहता है।

एक दिन कस्बे की शांति तब टूटती है जब एक खूंखार लकड़बग्घा लोगों पर हमला कर देता है।
पार्थीबन बिना डरे, अपनी जान दांव पर लगाकर उस जानवर को काबू में कर लेता है।
उसकी यह वीरता कैमरों में कैद होती है, और अगली ही सुबह देशभर के अखबारों में उसकी तस्वीरें सुर्खियाँ बन जाती हैं।

यहीं से कहानी मोड़ लेती है —
दक्षिण भारत में बैठा एक कुख्यात अपराधी हारोल्ड दास (अर्जुन सरजा), इन तस्वीरों को देखकर चौंक उठता है।
उसे अपने भतीजे लियो दास की याद आ जाती है — वह लड़का जो सालों पहले एक भयानक हादसे के बाद रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया था।
पार्थीबन की शक्ल हूबहू लियो जैसी है, और यही समानता पूरी फिल्म की जड़ बन जाती है।

अब कहानी हिमाचल से सीधे अपराध की दुनिया की गलियों में पहुँचती है।
हारोल्ड का बड़ा भाई एंथनी दास (संजय दत्त) खुद पार्थीबन से मिलने निकल पड़ता है।
वह उसे पहचानने की कोशिश करता है, लेकिन पार्थीबन किसी भी हाल में लियो होने की बात से इनकार कर देता है।
हालांकि, जैसे-जैसे हालात बिगड़ते हैं, दर्शक खुद सोचने पर मजबूर हो जाता है —
👉 क्या यह शालीन कैफे मालिक वास्तव में वही लियो है, जिसका अतीत खून और हिंसा से सना था?
या फिर कोई और राज़ छिपा है उसकी ज़िंदगी में?

Second Half से Climax तक

लकड़बग्घे की घटना के बाद पार्थीबन का जीवन अचानक सुर्खियों में आ जाता है।
एक साधारण इंसान की बहादुरी ने पूरे कस्बे को उसका मुरीद बना दिया है — लेकिन उसके भीतर कुछ ऐसा बदल रहा है, जिसे कोई नहीं देख पा रहा।
शहर से दूर पहाड़ों की ठंडी हवा में अब एक रहस्य की बू घुल चुकी है।

इसी बीच, दक्षिण भारत का डॉन एंथनी दास (संजय दत्त) हिमाचल की ओर रवाना होता है।
उसका मकसद साफ है — उस आदमी से मिलना जिसकी शक्ल हूबहू उसके लापता भाई लियो दास जैसी है।
जब एंथनी पहली बार पार्थीबन से मिलता है, तो उसकी आँखों में एक अजीब पहचान की चमक होती है।
वह उसे “लियो” कहकर बुलाता है, लेकिन पार्थीबन ठंडे लहजे में कहता है —

“मैं कोई लियो नहीं, सिर्फ एक पिता और पति हूँ।”

लेकिन एंथनी की दुनिया इतनी आसान नहीं थी।
वह मानने को तैयार नहीं कि उसके सामने खड़ा ये शख्स कोई और हो सकता है।
वह पार्थीबन की परिवार और अतीत दोनों पर नज़र डालना शुरू करता है।
धीरे-धीरे पार्थीबन के जीवन में डर, संदेह और अंधकार प्रवेश करने लगता है।

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सस्पेंस और संघर्ष

एक के बाद एक अजीब घटनाएँ घटने लगती हैं —
रात के सन्नाटे में अजनबी लोग उसके कैफे पर हमला करते हैं।
कभी उसकी पत्नी पर जानलेवा वार होता है, तो कभी उसके बच्चों के आसपास संदिग्ध चेहरे मंडराने लगते हैं।
हर बार पार्थीबन उनसे बच निकलता है, लेकिन उसकी हर हरकत में अब एक पुराने योद्धा की झलक दिखने लगती है।उसकी चाल, उसकी नज़रें, उसका गुस्सा — सब कुछ किसी खूंखार अतीत की गवाही देते हैं।
अब दर्शक भी सोच में पड़ जाता है — क्या सच में पार्थीबन वही लियो है, जो कभी गैंगस्टर दुनिया का सबसे खतरनाक नाम हुआ करता था?

अतीत का दरवाज़ा खुलता है

जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, हमें फ्लैशबैक में ले जाया जाता है —

जहाँ लियो दास, एंथनी और हारोल्ड दास तीनों भाई कभी साथ थे।

उनका साम्राज्य अपराध और हथियारों पर टिका था।

लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया — लियो ने उस काले खेल से निकलने की कोशिश की, मगर हिंसा की लपटों में उसकी ज़िंदगी झुलस गई।सबको लगा वह मर गया, जबकि असल में वह बच निकला और एक नई पहचान में छिप गया — पार्थीबन के रूप में।

क्लाइमेक्स – जब अतीत और वर्तमान टकराते हैं

कहानी पहुँचती है अपने शिखर पर एंथनी दास अपने लोगों के साथ पार्थीबन के घर पर हमला करता है।
कैफे, जो कभी खुशियों की जगह थी, अब युद्धभूमि बन जाता है।
पार्थीबन अपनी पत्नी और बच्चों की रक्षा के लिए फिर वही बन जाता है, जिससे वह भागना चाहता था — लियो

उसके हाथों में फिर वही ताकत, वही जुनून लौट आता है।
एक-एक कर दुश्मनों को खत्म करते हुए वह साबित कर देता है कि अतीत कभी मिटता नहीं, बस शांत हो जाता है।
क्लाइमेक्स में एंथनी और लियो की भिड़ंत दिल दहला देने वाली है —
गोलियों, आग और प्रतिशोध के बीच दोनों की आखिरी टक्कर एक भावनात्मक विस्फोट की तरह लगती है।

अंत में, जब धूल बैठती है, पार्थीबन — यानी लियो — अपने परिवार को बचा लेता है।
लेकिन उसकी आँखों में अब एक सन्नाटा है — उसने अपनी पहचान वापस पा ली, पर अपनी शांति खो दी।

फिल्म का सार

Leo movie Review सिर्फ एक एक्शन फिल्म नहीं, बल्कि पहचान, परिवार और अतीत से भागने की कोशिश की कहानी है।

यह दिखाती है कि इंसान चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, उसका अतीत किसी न किसी दिन उसके दरवाज़े पर लौटकर जरूर आता है।

विजय ने इस भूमिका को जिस तीव्रता और संवेदनशीलता से निभाया है, वह इस फिल्म की आत्मा बन जाती है।

निष्कर्ष

अगर आप सोचते हैं कि एक्शन फिल्मों में सिर्फ मारधाड़ होती है, तो “Leo” आपको गलत साबित कर देगी।
यह फिल्म दर्शाती है कि कभी-कभी सबसे बड़ी लड़ाई बंदूकों से नहीं, आत्मा के भीतर लड़ी जाती है।

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